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Saturday, 14 February 2015

Lesson - 18 Meanings!

गीताया: श्लोका:

1.  यो मां पष्यति सर्वत्र, सर्वं च मयि पश्यति .
     तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति .

One who sees me in all, and sees all in me, to him I am not lost, and he is not lost to me.

मूल अर्थ: मुझे हर जगह देखता है, हर प्राणी में मेरे दर्शन करता है, यह मान कर चलता है कि  मानव सेवा ही नारायण सेवा है, मैं  वह मुझसे कभी अलग नहीं होता।

भावार्थ : जीवन का लक्ष्य यही है कि हम दूसरों के लिए जियें , इसलिए यही सही होगा कि  हम अपने मन को शुद्ध को रखकर जितना हो सके भेदभाव भुलाकर, ईर्ष्या आदि त्याग कर दूसरों की मदद करें। यह तभी संभव है जब हम हर प्राणी, छोटा या बड़ा हरेक में ईश्वर को देखें।  ऐसा जीव मृत्यु के बाद भी जीवित रहता है।

2.    ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् .
       मम्  वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्या: पार्थ सर्वश: .

In whichever way submits to me in total surrender, I would reward them accordingly.  In whatever way / form a person submits to me I'll be available to them in that form. The ways of devotion may be different, but ultimately, everyone comes unto Me.


जो कोई तन - मन - धन से मेरी शरण में आए, मैं  उसका फल उसे अवश्य दूँगा।

भावार्थ:  चाहे मनुष्य मुझे किसी भी रूप में अर्थात सखा, माता, पिता, भाई, बहन, बंधु , अपना कार्य आदि में देखे, मैं  उसे उसका फल अवश्य दूँगा  . मेरी शरण में आने के की मार्ग हैं , परन्तु अंत में सब मुझे पा ही लेते हैं।

3 .  असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् .
      अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण् च गृह्याते .

Without any doubt, the human mind is fickle - natured, ever-changing and distracted, but with regular practice and detachment, it could be definitely controlled.

निःसंदेह , हे वीर, कुंती - पुत्र ,मन बहुत ही चंचल है , किन्तु अभ्यास (मेहनत ) एवं वैराग्य मनोभाव से इसे वश में किया जा सकता है। 

हमारा मन बहुत ही चंचल होता है, यह हमें हर इच्छा की ओर  आकर्षित करता है, और हम भी इसकी ओर  खिंचे  चले जाते हैं , किन्तु कठिन अभ्यास से हम इस चंचल मन को भी अपने वश  में कर सकते हैं।

4 . यदा - यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत .
     अभ्युत्थानमधर्मस्य  तदात्मानं स्रुजाम्यहम् .

O Arjuna! Whenever evils and unrighteousness rear their ugly head, I come down to help all those who have complete faith in me and surrendered to me .

हे भारत (अर्जुन)! जब - जब धर्म को क्षति पहुँचती है, और अधर्म की वृद्धि होती है, तब - तब मैं इस संसार में साकार रूप में प्रकट होता हूँ   .

कलयुग में हर प्राणी चाहे वह सज्जन ही क्यों न हो, उसे हर कदम पर अधर्म का सामना करना पड़ता है।  धर्म धीरे - धीरे मिटता जा रहा है।  चारों तरफ़  अधर्म - ही - अधर्म है। ऐसे में भगवान श्री  कृष्ण कहते हैं  कि  वह हमारी सहायता के लिए किसी - न - किसी रूप में प्रकट होते हैं। 

5 .  परित्राणाय साधूनाम् विनाशाय च दुष्कृताम्
      धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे - युगे .

To deliver / save good people from evil and to uproot the cause of evil I come down in different forms / avataars to reinstate Dharma / righteousness.

सज्जनों  को अधर्म से बचाने के लिए पापों / पापियों का विनाश करने के लिए और धर्म को पुन: स्थापना करने के लिए मैं इस धरती  पर कई  अवतार लेता हूँ। 

हर युग में धर्म और अधर्म, सत्य और असत्य, अच्छे और बुरे के बीच लड़ाई चलती रही है।  जब अधर्मी धार्मिक भक्तो को पीड़ित करते हैं तब भगवान कोई अवतार लेकर सज्जनों  को दुर्जनों  से बचाकर , पापियों का विनाश करने और धर्म का फिर से स्थापना करते हैं। 

सबकी दोस्त,

लक्ष्मी आर. श्रीनिवासन।  :-)))

Sunday, 8 February 2015

Lesson - 15 Rituraaj Vasanth

ऋतुराज: वसन्त:
 
 
1.  (a )  स्वच्छं 
 
     (b )  षड् 
 
     (c )  भ्रमरा:
 
     (d )  वसन्त:
 
     (e )  पुष्पाणां 
 
2.  (b )  का ऋतुराज: कथ्यते ?
 
     (c )  सर्वत्र केषां सुगन्ध: प्रसरति ?
 
     (d )  पुष्पाणां उपरि के गुञ्जन्ति ?
 
     (e )  वृक्षेषु के जायन्ते ?
 
     (f )  सर्वे जना: केषु भ्रमन्ति ?
 
3.  (a )  आकाशः     - प्रमुदिता 
 
     (b )  स्वच्छं    -    निर्मलम् 
 
     (c )  पुष्पाणां   -  कुसुमानां 
 
     (d ) कमलानि  - पङ्कजानि 
 
    (e )  वृक्षेषु       - तरुषु 
 
    (f )  मनुष्या:   -  मानवा:
 
4.  (a )   भौगोलिक 
 
     (b )   षड् 
 
     (c )   भ्रमरा:
 
     (d )  होली 
 
    (e )   पीतम् 
 
5.  (a )  मन्दं  - शीघ्रम् 
 
     (b )  बाला: - वृद्धा:
 
     (c )  प्रसन्ना  - दुःखिता 
 
    (d )  दिवसे  - रात्रौ 
 
    (e )   आकाश:  -  परताल:
 
    (f )  अस्मिन्  - तस्मिन् 
 
6.   (a )  गायन्ति -  लट्   प्रथम्   बहुवचन 
 
      (b )  नृत्यन्ति - लट्   प्रथम बहुवचन 
 
      (c )  भवति   - लट्  प्रथम एकवचन 
 
     (d )  गुञ्जन्ति - लट्  प्रथम बहुवचन 
 
    (e )   वहति - लट्  प्रथम एकवचन 
 
 
Everyone's friend,
 
Seetha Lakshmi. :-)))


Tuesday, 3 February 2015

Lesson - 14 Vidya Mahima!

विद्या महिमा 

1.   अपूर्व कॊपि कॊशॊयम् विद्यते तव भरति .
      व्ययतो वृद्धिमयाति क्षयमायाति सञ्चयात् .

मूल अर्थ :  हे ! सरस्वती माता , यह  विद्या बडी ही अनोखी वस्तु है. जितना हम उसे व्यय अर्थात्  खर्च करे, वः उत्नी ही बढ़ती है।  किन्तु अगर इसे अपने तक सीमित  रखें  तो , वह नष्ट हो जाती है। 

भावार्थ:  इस संसार की भलाई इसी में हैं  कि  हम अपनी विद्या दूसरों के साथ बाँटें, जितना कोई अपनी विद्या बांटेगा, वह उसके मस्तिष्क में उतना ही पत्थर की लकीर बनकर शाश्वत रहेगा. सदियों तक रहेगा वरना मिट जाएगा। 

दोहा :

सरसुती के भण्डार की, बड़ी अपूरब बात।

ज्यों खर्चे त्यों त्यों बढे , बिन खर्चे मिट जाए।

यह वृन्द का दोहा भी हमें यही सिखाता है।


O Goddess Saraswati! You treasury called knowledge is indeed mysterious. As one spends more of it the more one learns, whilst when not shared, loses it forever!

Whatever one is good at or has learnt well, must be shared not only for the welfare and upliftment of others but also to for one's own good. This is can be elaborated as when one shares one's knowledge about a subject it strengthens the neural pathway that contains that specific information and also allows one to learn in turn. If this knowledge is kept to oneself and not shared, it gets erased not only from one's own mind but also from this world forever.

2.  विद्वत्वम् च नृपत्वं च नैव तुल्यं कदाचन .

     स्वदेशे पूज्यते राजा , विद्वान् सर्वत्र पूज्यते .

मूल अर्थ :  विद्वान् व्यक्ति और धनी व्यक्ति या राजा की तुलना नही . अपने राज्य मे राजा पूजा जाता है वरन विद्वान् की हर स्थान मे पूजा होती है .

भावार्थ :   जो धनी व्यक्ति है , जिसके पास धन का भण्डार है उसका आदर केवल उसके अपने देश, राज्य या क्षेत्र में होता है, किन्तु विद्यागुन से संपन्न विद्वान का संसार में हर स्थान में आदर होता है।  जब तक धन है, आदर है किन्तु विद्या ऐसी सम्पत्ति है जो मृत्यु तक रहती है।

Though there is no comparison between a rich, influential person and a learned man. A king is worshipped in his kingdom, while a learned man is worshipped everywhere!

A rich person is worshipped / sought after only in his area, kingdom or reach of power, or till the wealth and the influence lasts! Whereas, a learned person is worshipped forever. Not just in his area of influence but also outside of it! His fame lasts till eternity!

3.  रूपयौवनसंपन्ना: विशालकुलसम्भवा :.
     विद्याहीना: न शोभन्ते निर्गन्धा इव किशुका :

मूल अर्थ :   रूप और यौवन से संपन्न व्यक्ति, जो धनि परिवार में पैदा हुआ हो, व अगर विद्या संपत्ति से हीन  हो , तो वह  किन्शुक यानी पलाश वृक्ष के उन सुन्दर पुष्पों के समान  है, जिसमे सुंदरता तो है किन्तु सुगंध नहीं।

भावार्थ :  जिस तरह पुष्प का सुन्दर होना ही नहीं वरन उसका सुगन्धित होना भी आवश्यक है , उसी तरह बड़े, धनी , कुलीन परिवार में केवल पैदा होने से कोई बड़ा नहीं बन जाता, उसमे विद्या नामक गन होना भी उतना ही आवश्यक है।

No matter how rich, beautiful / handsome or born into a family of influence or intelligence, if one remains uneducated, he is equivalent to the flowers of the Kinshua / Palasha tree, which though beautiful to look at, have no smell!

Our family heritage and lineage is of no value, if we are not educated properly, not only in the literal sense that is, number of degrees accumulated, but educated in the real sense.

4.  न चोरहार्यं न राजहार्यं , न भ्रातृभाज्यं न च भारकारि ,
     व्यये कृते वर्धते एव नित्यं, विद्याधनं सर्व धन प्रधानं .

मूल अर्थ :  न चोर चुरा सकता है, न राजा आदेश द्वारा चीन सकता है , भाइयों में बांटा नहीं जा सकता, न ही यह भारी है , जितना खर्चे उतना ही बढे यह विद्या धन, जो धनों में सर्वप्रधान है।

भावार्थ :    केवल विद्या धन ही ऐसी संपत्ति है, जो हमारे साथ सदैव रहेगी।  यही एक ऐसी संपत्ति है जिसे कोई बल द्वारा हमसे  छीन  नहीं सकता। . जितना हम इसे खर्चेंगे यह उतना ही बढ़ेगा। 


Thieves cannot steal, neither can the King order it out of us, nor cannot it be divided among one's brothers / siblings and it is not heavy either. The more you spend, the more you gain, such is the property of the wealth called Education!

Education is the only wealth that remains with us forever. We can be robbed of any other possession, but never of this precious wealth. The more you spend, the more you gain.

5.  विद्या ददाति विनयं, विनयात् ददाति पात्रतां .
     पात्रत्वाद धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततस्सुखम् .

मूल अर्थ :  विद्या प्राप्ति से विनम्रता मिलती है, विनम्रता से अच्छे गुण , इन गुणों से धन की प्राप्ति होती है जिसके द्वारा संसार के सभी सुख मिलते हैं। 

भावार्थ :  विद्या अर्थात ज्ञान से हम में विनम्रता अर्थात दूसरों को हैं न समझने की और उनका आदर करने की भावना उत्पन्न होती है , विनम्रता से बाकी  सद्गुणों का अपने - आप विकास होता है , इससे धन की प्राप्ति होती है और अंत में व्यक्ति संसार का सबसे सुखी व्यक्ति बन जाता है। 

By education one becomes humble, humility paves way to a good and strong character, through character one earns wealth and finally this wealth gives peace and happiness.

By vale - based education one learns to be humble and be patient of others and starts respecting others. This humility helps in character - building. When one has a beautiful character, one works hard, through which wealth is amassed, and when wealth is earned through honest means it gives peace of mind and finally happiness.

Everyone's Friend,

Seetha Lakshmi. :-)))

Thursday, 29 January 2015

Lesson - 13 Exercises!

1.

क .   बद्रका नाम ग्रामे अभवत् .

ख .  श्री बैजनाथ :

ग .  चतुर्दश वर्षे

घ .  वेत्रप्रहारक:

ङ् .  स्वतन्त्रता आन्दोलनार्थं

2. 

क .  न्यायाधीश :   चन्द्रशेखरम्

ख .  चन्द्रशेखर:    न्यायधीशम्

ग .  न्यायाधीश:   चन्द्रशेखरम्

घ .  न्यायाधीश:   चन्द्रशेखरम्

ङ् .  चन्द्रशेखरम्   न्यायाधीशम्

3.














4.

(ii )  श्री बैजनाथ:

(iii )  कारागारे

(iv )  वेत्रप्रहारक:

(v )   एकाकी  शत्रव:

5.

क .  उन्नजवनपदे बदरका नामक ग्रामे

ख .  वाराणस्यां क्वीन्स्कालेज प्रसिद्धस्य संस्कृतमहाविद्यालये

ग .  भगत सिंह: , राजगुरु जयगोपाल: , राम्प्रसादबिस्मिल्:

घ .  चतुर्दश वर्षे

ङ् .  अन्तिमया गुलिकया आत्मानं हत्वा स्वकीयम् .

Rest in next.

 

Wednesday, 28 January 2015

Lesson - 12 Exercises!

1.  पूर्ण्वाक्य् मे उत्तर दीजिए:

 क.    अनु उपसर्ग पूर्वक शासनं शब्देन
ख .    नियामानं पालनं नियन्त्रणं स्वीकरणम् वा
ग .    प्रात: शीघ्र जागरणं , नियमित व्यायामं , नियमेन स्वकार्यं करणम्, कार्य प्रति पूर्ण्समर्पणम् .
घ .   शाश्वता:, ध्रुवा :
ङ् .    छात्राणां .

2.   true  or  false :

सही , गलत , सही, गलत , सही , गलत .

3.  अनुशानास्य , प्रकृत्या : , नियन्त्रणं , उत्थानाय् , अनुसरणं , शाश्वता: .

4. 
क.  क्षेत्रे    -  प्रथमा / द्वितीया  द्विवचन
ख . प्रकृत्या :  षष्ठी , एकवचन
ग . ध्यानेन -  तृतीया , एकवचन
घ . जीवनस्य - षष्ठी , एकवचन
ङ् . जीवने - प्रथमा / द्वितीया , द्विवचन्, सप्तमी -
च . राष्ट्रस्य - षष्ठी , एकवचन

5.

क .   सन्ति - अस्ति
ख .   वर्तन्ते - वर्तते
ग .   कथ्यन्ते  - कथ्यते
घ .   दृश्यन्ते - दृश्यते
ङ् .   अपेक्षन्ते - अपेक्षते
च .  आयन्ति - आयति
छ .  पठन्ति - पठति

6.

क .    प्रकृत्या: नियमा: शाश्वता:, ध्रुवा: च सन्ति .
ख .   छात्राणां कृते अनुशानस्य बहुमत्वं अस्ति .
ग .   सर्वा: ऋतव: अनुशासनम् स्वीकृत्य क्रमश: आयन्ति .
घ .   सृष्ट्या: मूलेपि अनुशासनम् दृश्यते .
ङ् .   शरीरस्य आरोग्याय यथा संतुलित भोजनं अपेक्षते .

सबकी दोस्त ,
लक्ष्मी . :-)

Saturday, 17 January 2015

Exercises

1. 

(i)      जलमन्नंसुभाषितम्
(ii )    शुष्कवृक्षाश्च मूर्खाश्च
(iii )   व्यसनेन , निद्रा, कलहेन
(iv )   यस्य दानवती लक्ष्मी
(v )    फलन्ति वृक्षा:, गुणिनो जना :

2.

(i )    त्रीणि
(ii )   लोचनाभ्याम्
(iii )  गुणिनो
(iv )  धीमताम
(v )   शुष्कवृक्षाश्च , मूर्खश्च
(vi )  पाषाणखण्डेषु

3 . 

(i )     रत्नानि
(ii )    रत्नसंज्ञा
(iii )  प्रज्ञा
(iv )   वृक्षा:
(v )   धीमताम

४.

प्रज्ञा  - बुद्धि:
नेत्राभ्याविदुषाम्
मूर्खे :
विदुषाम्
मधुरा
धरायाम्

5 . 

मूढै :      -    सप्तमी     एकवचनम्

लोचनाभ्याम्  -   चतुर्थी      द्विवचनम्

विहीनस्य   -  षष्ठी       एकवचनम्

वृक्षा:   -  प्रथमा    बहुवचनम्

निद्रया  -  तृतीया   एकवचनम्

6 .

धीमताम कालो गच्छति   काव्यशास्त्राविनोदेन

व्यसनेन  च मूर्खानाम्  निद्रया कलहेन वा।


Everyone's friend,

Lakshmi R. Srinivasan . :-)))

Lesson - 11

पृथ्वी पर तीन रत्न उपलब्ध हैं - जल, अनाज और मधुर वचन, किन्तु मानव जाति पत्थर यानि बहुमूल्य रत्नों के पीछे दौड़ता है।

भावार्थ : मनुष्य जीवन में बहुत अनमोल जल, अन्न और मधुर वचन या पुस्तक यानि अच्छे सीख देने वाले शास्त्र हैं, किन्तु मनुष्य धन जुटाने की  होड़ में है। 

जिस व्यक्ति को स्वबुद्धि न हो उसका शास्त्र से क्या लेना - देना ? जिस तरह एक नेत्रहीन व्यक्ति के हाथों में दर्पण हो।

भावार्थ :  मनुष्य की सबसे बड़ी उपलब्धि है, स्वयं के बारे में ज्ञान, इसका अर्थ यह है कि  जिसने स्वयं की कमज़ोरियों पर विजय प्राप्त नहीं किया उसका शास्त्र पठन  से या विद्या प्राप्त करने से कोई लाभ नहीं।

फलों से लड़े पेड़ झुकते है, सर्वगुण संपन्न व्यक्ति आदर में झुकते हैं , किन्तु सूखे हुए पेड़ और मूढ़ व्यक्ति कभी नहीं झुकते। ,

भावार्थ :  जिस तरह मीठे पके हुए फलों से लड़े वृक्ष अपने भार के कारण झुकते है, उसी तरह सभी सत  गुणों से सुसज्जित व्यक्ति , जिसमे अहम की भावना न हो  वह भी समयानुसार झुक कर कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करता है. परन्तु सूखे हुए वृक्ष जिसमे अब कभी फल नहीं लग सकते उनमे झुकने की संभावना कदापि नहीं, उसी तरह मुर्ख व्यक्ति यानि  कि  व्यक्ति जिसमे अहंकार हो वह कभी किसी के सामने नहीं झुकता।

विद्वानों का समय काव्य, शास्त्र आदि के पठन  में जाता है, किन्तु मुर्ख, अज्ञानियों का समय झगड़ों में, दुष्कर्मों  में और निद्रा में व्यतीत होता है।

भावार्थ:  सज्जन व्यक्ति अपना समय सत्कर्मों में  और दुर्जन दुष्कर्मों में बिताते हैं।

वाणी की मधुरता प्रयत्न के साथ - साथ बढ़ती है , जिस प्रकार धन के दान से जीवन सफल होता है।

भावार्थ:  कोई भी कार्य प्रयत्न के द्वारा सफल होती है उस प्रकार धन दान करने से अपने लक्ष्य को प्राप्त करता है।  धन जुटाना कोई बड़ी बात नहीं , उसे दान करना भी आना चाहिए। 

सबकी दोस्त ,

लक्ष्मी आर।  श्रीनिवासन।  :)))

Friday, 28 November 2014

Exercises for Lesson - 10

1.  निम्नलिखित प्रश्नों  एक पद में एक  दीजिए :

उत्तर : 


(i )     बोपदेव:
(ii )    मंदमति :
(iii )   इतस्तत:
(iv )   जलेन
(v )    बालक:

2 . पूर्णवाक्य में उत्तर दीजिए:

(i )    अहम नूनं मूर्ख :, मम  भाग्ये विद्या नास्ति।
(ii )   विद्यालयात्।
(iii )  कूपम्
(iv )  महान पंडित : वरदराज:
(v )  लघुसिद्धान्त  कौमुदी नामकम्

इन में मैंने केवल उत्तर दिए हैं, कृपया  पाठ्यपुस्तक में देखकर पूरा उत्तर लिखें।

3 . निम्नलिखित को उदाहरण् के  अनुसार लिखो :

(i )     अकुर्वन्
(ii )    अपठत्
(iii )   अचिन्तयत् 
(iv )   अकरोत्  
(v )    अपश्यत्
(vi )   अपूरयत् 
(vii )  अभवत् 
(viii ) अरचयत् 

4.  सही विकल्प के सामने सही क चिह्न लगाइए :

(i )    बालक:
(ii )   कुपित:
(iii )  विद्या 
(iv )  तीव्रा
(v )   वरदराज:

5.   समानार्थक् पद मिलाइए :

छात्र :                                     विद्यार्थी 
मूर्ख:                                      मूढ:
कुपित:                                  क्रोधित:
नार्य:                                     स्त्रिय :
घट                                        कुम्भ:
प्रसिद्ध:                                  विख्यात:

6.   निम्न पदों  को संकृत वाक्यो ममे प्रयोग कीजिए :

(i )   तस्य नाम बोपदेव्: आसीत् .
(ii )  गुरु: तस्योपरि कुपित:अभवत् .
(iii ) नूनम् मूर्ख: अस्मि, मम भाग्ये विद्या नास्ति .
(iv ) एकदा तस्य गुरु: तं विद्यालयात् बहि: अकरोत् .
(v )  मार्गे गच्छन स: एकं कूपम् अपश्यत् .
(vi ) स: तीव्रमति: बालक: अस्ति .

सबकी सखी ,
लक्ष्मी आर श्रीनिवासन।  :-)))
 

Thursday, 27 November 2014

Lesson - 10 Explained!

अभ्यास: परम्: गुरु:

पुरा: एक: बालक: आसीत् .  तस्य नाम बोपदेव: आसीत् . स: मन्दमति: छात्र: आसीत्. स: यत् पठति  सं तत् विस्मरति स्म . सर्वे तस्य सहपाथिन: तस्य उफासं कुर्वन्ति स्म .

*** किसी पुराने समय में एक बालक था।  उसका नाम बोपदेव था।  वह काम बुद्धि वाला विद्यार्थी थ. वह जो भी पढता वह सब भूल जाता था।  उसके सारे सहपाठी उसका उपहास / मज़ाक उड़ाया करते थे। 

एकदा तस्य गुरु: तस्योपरि कुपित: अभवत् तं विद्यालयात् च बहि: अकरोत् . आत्मसम्मानेन् वञ्चित: भूत्वा स: अचिन्तयत् - "अहं नूनम् मूर्ख: अस्मि, मम भाग्ये विद्या नास्ति .

***  एक बार उसके गुरु ने बहुत क्रोधित होकर उसे विद्यालय से बाहर निकाल दिया . आत्म्सम्मान्  से वंचित होने पर (ठेस लगने पर) उसने सोचा , " मैं  अवश्य ही मूर्ख हूँ , मेरे भाग्य में विद्या नहीं है।  "

दुखित: सन्  बोपदेव इतस्तत: भ्रमणम् अकरोत् . एकदा मार्गे गच्छन्  बोपदेव: एकं कूपम् अपश्यत् . तत्र काश्चन नार्य: जलेन घटान  पूरयन्ति स्म .

*** दुखी होकर बोपदेव इधर - उधर घूमने लगा।  एक बार रास्ते में जाते हुए उसने एक कुँआ  देखा।  वहाँ  पर कुछ औरतें अपने घड़ों में पानी भर रहीं थीं। 

स: तत्र स्थित भूत्वा आश्चर्येण् अपश्यत् - यस्यां शिलायां स्त्रिय ; घटं स्थापयन्ति स्म: तत्र एक: गर्त: अभवत् . एतत् दृष्ट्वा बोपदेव; अचिन्तयत् - यदि घटेन  शिलाखण्डे  गर्त; भवति तर्हि पुन: पुन: अभ्यासेन मम बुद्धि अपि तीव्रा भविष्यति .

*** वहाँ  रूककर वह आश्चर्यपूर्वक देखने लगा।  जहाँ  पर औरतों ने घड़े रखे थे, वहा एक गड्ढा उभर आया था।  यह देखकर बोपदेव सोचने लगा , यदि घड़ों से पत्थर पर गड्ढा बन सकता है, तो मेरे बार - बार अभ्यास / प्रयत्न करने पर मेरी बुद्धि भी तीव्र हो सकती है। 

एवं चिन्तयित्वा बोपदेवा: पुन: विद्याप्राप्त्यै संकल्पम् अकरोत् . दत्तचित: भूत्वा स: परिश्रमेण अपठत . एवं कालान्तरे स; सहपाथिनाम् आचार्याणाम् च स्नेहं प्राप्तं .

***  ऐसा सोचकर बोपदेव ने फिर से पढ़ने का निश्चय किया. एकमन होकर उसने बहुत परिश्रम के साथ पढ़ाई की।  ऐसे ही कुछ समय बाद उसके सहपाठी और गुरु का प्यार उसे मिला। 

एष: (respectable form) संस्कृत व्याकरणस्य महान् पण्डित: वरदराज: इति अभिधानेन प्रसिद्दः अभवत् . स: लघुसिद्धान्त कौमुदिनामकं, संस्कृत - व्याकरणस्य पुस्तकं अरचयत् .

***  यह संस्कृत व्याकरण (grammar) के महान पंडित, वरदराज के नाम से जाने जाते हैं।  इन्होनें  लघुसिद्धान्त कौमुदी नामक संस्कृत व्याकरण का पुस्तक रचा (की रचना की).


सबकी दोस्त,

लक्ष्मी आर. श्रीनिवासन।  :-)))
 

Wednesday, 12 November 2014

Lesson - 9 Exercises!

महर्षि : दयानन्द :

1.    निम्नलिखित प्रश्नों के एक पद मे उत्तर दीजिए -

क.  महर्षे: दयानन्दस्य पितु: नाम: किं आसीत्?

उ. महर्षे: दयानन्दस्य पितु: नाम अम्बाशन्कर: आसीत् .

ख. महर्षे: दयानन्दस्य जन्म नाम किं आसीत् ?

उ.  महर्षे: दयानन्दस्य जन्म नाम मूलशङ्कर्: आसीत्.

ग. महर्षे: दयानन्दस्य गुरु: क: आसीत् ?

उ.  महर्षे: दयानन्दस्य गुरु: प्रग्याचक्षुस्वामी विरजानन्द: आसीत् .

 घ. स: बाल्यकालादेव कीदृश: स्वभाव: आसीत् ?

उ.  स: बाल्यकालादेव विरक्त: स्वभाव: आसीत् .

ङ  महर्षि  दयानन्द: कस्य धर्मस्य प्रचारं कृतवान् ?

उ.  महर्षि दयानन्द: वैधिक: धर्मस्य प्रचारं कृतवान् .

2.  पूर्ण्वाक्य मे उत्तर दीजिए -

क.  महर्षि दयानन्दस्य जन्म कस्मिन् प्रान्ते अभवत् ?

उ.  महर्षि दयानन्दस्य जन्म काठियावाढ प्रान्ते अभवत् .

ख. महर्षि दयानन्द: किं प्रतिज्ञातवान ?

उ.  महर्षि दयानन्द: समाजात अज्ञानस्य अन्धकारम् दुरिकर्तुं  ग्यानन्ञ्च्  प्रकाशयितुं प्रतिज्ञातवान .

ग. वैदिक धर्मस्य प्रचारं कर्तुम्  स: किं कृतवान्  ?

उ.  वैदिक धर्मस्य प्रचारं कर्तुम्  आर्यसमाजम् स्थापितवान् .

घ. स: कस्य शिष्योभवत ?

उ.  स: प्रग्याचक्षुस्वामी विरजानन्द: शिष्योभवत .

ङ  महर्षे: दयानन्दस्य पञ्चग्रन्थानम् नामानि लिखत .

उ.  गोकरुणनिधि: , पञ्चमहायग्यविधि: , स्वमनतव्यामन्तव्य प्रकाश: , ऋग्वेदादि भस्य भूमिका, संस्कार विधि: च .

3.  रिक्त स्थानोन की पूर्ति कीजिए :

क.  बाल्यकाले स: शिवभक्त: आसीत् .

ख. गृहं गत्वा स: सन्यासम् गृहीतवान .

ग.  असौ सर्वप्रथम मुंबई नगरे आर्यसमाजम् स्थापितवान् .

घ.  भारतदेश: सदैव तस्य ऋणी  भविष्यति .

ङ . स: बाल्यकालादेव विरक्तस्वभाव: आसीत् .

4.  निम्नलिखित पदों  मे वचन बदलिए :

पद                                               बहुवचन

अभवत्                                         अभवन्

आसीत्                                          आसन

प्रतिज्ञावान                                    प्रतिज्ञावन्त:

भविष्यति                                      भविष्यत:

कृतवान                                         कृतव:

गृहीतवान                                      गृहीतवन्त:

स्थापितवान्                                  स्थापितवन्त:

5.  उचित मिलान करके वाक्य बनाइए :

(अ)                                                (ब)

स:   बाल्यकालादेव                      विरक्त स्वभाव: आसीत् .

अस्य पितु: नाम                          अम्बाशन्कर: आसीत् .

परं  पश्चात् स:                            निराकारस्य ईश्वरस्य पूजाम् कर्तुं आरभत .

गृहं त्यक्त्वा                                स: सन्यासम् गृहीतवान .

भारतदेश: सदैव तस्य                  ऋणी  भविष्यति .

6.  सही विकल्प के सामने सही का चिह्न लगाइए :

क.  महर्षे: दयानन्दस्य जन्म काथियावद प्रान्ते विप्रस्य गृहे अभवत् .

ख.  असौ सर्वप्रथमं आर्यसमाजम् स्थापितवान् - मुंबई नगरे

ग.  स्वामी दयानन्दो भारते परिभ्रम्य सर्वत्र प्रचारं अकरोत् - वैदिक धर्मस्य .

7.  निम्नलिखित पदों  मे विभक्ति तथा वचन बताइए :

पद                        विभक्ति                    वचन

ईश्वरस्य               षष्ठी                         एकवचन 

पितु:                    षष्ठी                          एकवचन

आर्यसमाजेन्       तृतीया                        एकवचन

गुरुकुलानि         प्रथमा / द्वितीया         बहुवचन

स्वामिना           तृतीया                         एकवचन

महान्                प्रथमा                         एकवचन

बस खतम . :--)))

सबकी दोस्त ,

लक्ष्मी आर।  श्रीनिवासन।  :-)))
 

Tuesday, 28 October 2014

Lesson - 8 Exercises!

1.   Q / A

a.  कस्मिन्श्चिद अधिष्ठाने
b.  अस्मद् उपार्जित वित्तस्य समभागो
c.  कतिचिदस्थीनि
d.  चर्म, मांस, रुधिरम्
e.  को गुणो विदयाया:

2.  यावज्जीवनम्
तावत् + सुबुद्धिना
ततश्चेकैन
वृक्षं + आरोहामि
सिन्हेनोत्थाय
अत: + अयम्
वृक्षादवतीर्य

3.
अ. राजप्रतिग्रहो
b . अस्थिसञ्चयम्
c . शास्त्रपरङ्गमुख:
d . अस्माकमेकश्चतुर्थो
e . तिष्ठतु
f .  बुद्धि:
g . स्वोपार्जितम्

4.

a .   मित्रभावं    x   वैरभावम्  
b .   ज्येष्ठ:      x   कनिष्ठ:
c .  सुबुद्धि:       x   दुर्बुद्धि:
d .  सजीवम्    x    निर्जीवम्
e .  विफ़लताम्  x  सफ़लताम्
f .  गच्छ          x  आगच्छ

5. 
ब्राह्मणपुत्रा:    प्रथमा     एक
तेषां                षष्ठी     बहु
बुद्धिमान्       द्वितिया बहु
स्वगृहं          प्रथमा      एक
वित्तस्य    षष्ठी          एक

6.

कस्मिन्श्चिद अधिष्ठाने चत्वारो ब्राह्मण्पुत्रा: वसन्ति स्म .

त्वं गृहं गच्छ .

स: व्रिस्क्षादवतीर्य गृहं गत:

अहं वृक्षमारोहामि .

तै: मार्गे सिन्हेन् दृष्टानि.

Love and best wishes,
Lakshmi. :-)))

P.S. I've done whatever little I know. Please check with your respective teachers, please. There may be some spelling mistakes too so please consult your textbooks.



 

Thursday, 11 September 2014

dhatu roop

लट् लकार
 
पुरुष / वचन                एकवचन                 द्विवचन                 बहुवचन 
 
प्रथम पुरुष                  ....... अति               ....... अत:                ..... अन्ति 
 
मध्यम्  पुरुष              ......... असि             ........अथ:                ....... अथ 
 
उत्तम पुरुष                .......  आमि             ........ आव:              .......  आम:
 
 
लृट  लकार
 
पुरुष / वचन                एकवचन                 द्विवचन                 बहुवचन 
 
प्रथम पुरुष                 ...... इष्यति             ..... इष्यत:               ......इष्यन्ति 
 
मध्यम्  पुरुष             ....... इष्यसि            ...... इष्यथ:             ....... इष्यथ 
 
उत्तम पुरुष               ........ इष्यामि          ....... इष्यामि          ....... इष्यामि 
 
 
लङ्ग  लकार
 
पुरुष / वचन                एकवचन                 द्विवचन                 बहुवचन 
 
प्रथम पुरुष                 अ ..... अत्               अ ..... अताम्            अ ...... अन् 
 
मध्यम्  पुरुष             अ ...... अ:                अ ....... तम्              अ ...... अत 
 
उत्तम पुरुष               अ ...... अम्             अ ....... आव              अ ....... आम 
 
 
Please note that for पठ , हस् , क्रीड्  धातु the above mentioned rules apply in all three tenses, whereas in case of गच्छ पिब अन्द् पश्य dhaatu, it is different in future tense.
 
गमिष्यति पास्यति and द्रक्ष्यति like that.
 
Everyone's friend,
 
Lakshmi :-)))

Balak: , Baalikaa, Falam & Hari

बालक शब्द रूपाणि 

विभक्ति / वचन          एकवचन         द्विवचन          बहुवचन

प्रथमा                        बालक:             बालकौ             बालका:
द्वितीया                    बालकम्           बालकौ             बालकान्
तृतीया                       बालकेन           बालकाभ्याम्    बालकै:
चतुर्थी                        बालकाय          बालकाभ्याम्    बालकेभ्य:
पञ्चमी                      बाल्कात्           बालकाभ्याम्    बालकेभ्य:
षष्ठी                          बालकस्य         बालकयो :        बालकानां
सप्तमी                      बालके              बालकयो :        बालकेषु
संबोधन                      हे बालक !        हे बालकौ !        हे बालका:

बालिका शब्द रूपाणि 

विभक्ति / वचन          एकवचन           द्विवचन          बहुवचन

प्रथमा                         बालिका             बालिके             बालिका:
द्वितीया                     बालिकाम्          बालिके             बालिका:
तृतीया                        बालिकया          बालिकाभ्याम्   बालिकाभि:
चतुर्थी                         बालिकायै          बालिकाभ्याम्   बालिकाभ्य:
पञ्चमी                       बालिकाया:        बालिकाभ्याम्   बालिकाभ्य:
षष्ठी                           बालिकाया:        बालिकयो :       बालिकानाम्
सप्तमी                       बालिकायाम्      बालिकयो :       बालिकासु
सम्बोधन                    हे बालिका !       हे बालिके !       हे बालिका:


फ़लम् शब्द रूपाणि 

विभक्ति / वचन          एकवचन           द्विवचन          बहुवचन

प्रथमा                         फ़लम्               फ़ले                  फ़लानि
द्वितीया                     फ़लम्               फ़ले                  फ़लानि                  
तृतीया                        फ़लेन्               फ़लाभ्याम्        फ़लै:
चतुर्थी                         फ़लाय्              फ़लाभ्याम्        फ़लेभ्य:
पञ्चमी                       फ़लात्              फ़लभ्याम्         फ़लेभ्य:
षष्ठी                           फ़लस्य्            फ़लयो:              फ़लानाम्
सप्तमी                       फ़ले                 फ़लयो:               फ़लेशु
सम्बोधन                    हे फ़ल !           हे फ़ले !              हे फ़लानि !

हरि शब्द रूपाणि 

विभक्ति / वचन          एकवचन         द्विवचन          बहुवचन
प्रथमा                         हरि:               हरी                   हरय :
द्वितीया                     हरिम्             हरी                   हरीन्                  
तृतीया                        हरिना            हरिभ्याम्          हरिभि:
चतुर्थी                         हरये              हरिभ्याम्          हरिभ्य:
पञ्चमी                       हरे:               हरिभ्याम्          हरिभ्य:
षष्ठी                           हरे:               हरयो:                हरीनाम्
सप्तमी                       हरौ                हरयो:                हरिषु
सम्बोधन                    हे हरे!             हे हरी !               हे हरय :

Everyone's friend,
Lakshmi :-))

kim shabd roop

किम्  - क्या  (पुल्लिङ्ग् )

विभक्ति / वचन          एकवचन             द्विवचन          बहुवचन

प्रथमा                         क:         (किसने)              कौ        (किन दोनों ने )           के (किन सब ने )
द्वितीया                     कम्                    कौ                   कान्
तृतीया                        केन                    काभ्याम्           कै:
चतुर्थी                         कस्मै                 काभ्याम्           केभ्य:
पञ्चमी                       कस्मात्             काभ्याम्           केभ्य:
षष्ठी                           कस्य                कयो :               केशाम्
सप्तमी                       कस्मिन्            कयो :                केषु


किम्  - क्या  (स्त्रीलिङ्ग )

विभक्ति / वचन          एकवचन             द्विवचन          बहुवचन

प्रथमा                         का                      के                    का:
द्वितीया                     काम्                   के                    का:
तृतीया                        कया                   काभ्याम्          काभि:
चतुर्थी                         कस्यै                  काभ्याम्          काभ्य:
पञ्चमी                       कस्या:                काभ्याम्          काभ्य:
षष्ठी                           कस्या:               कयो :               कासाम्
सप्तमी                       कस्या:               कयो :               कासु

किम्  - क्या  (नपुन्सक्लिङ्ग् )

विभक्ति / वचन          एकवचन             द्विवचन          बहुवचन

प्रथमा                         किम्                   के                    कानि
द्वितीया                     किम्                   के                    कानि
तृतीया                        केन                    काभ्याम्           कै:
चतुर्थी                         कस्मै                 काभ्याम्           केभ्य:
पञ्चमी                       कस्मात्             काभ्याम्           केभ्य:
षष्ठी                           कस्य                कयो :                केशाम्
सप्तमी                       कस्मिन्            कयो :                केषु

हलन्त्   शब्द रूप     राजन्  शब्द रूप

विभक्ति / वचन          एकवचन              द्विवचन              बहुवचन

प्रथमा                       राजा                     राजानौ               राजान:
द्वितीया                     राजानम्                राजानौ              राज्ञ :
तृतीया                      राज्ञा                      राज्भ्याम्           राजभि :
चतुर्थी                      राज्ञे                       राजभ्याम्           राजभ्य:
पञ्चमी                     राज्ञ :                     राजभ्याम्           राजभ्य:
षष्ठी                        राज्ञ :                     राज्ञो:                 राज्ञाम्
सप्तमी                   राज्ञि                       राज्ञो :                राजसु  
अष्टमी                    हे राजा !                हे राजानौ!         हे राजान :


Sanskrit Grammar Help Sarvanaam Shabd Roop

अस्मद् शब्द रूपाणि

विभक्ति/वचन एकवचन             द्विवचन           बहुवचन

प्रथमा              अहम्                 आवाम्               वयम्
द्वितीया          माम्                   आवाम्              अस्मान्
तृतीया             मया                   आवाभ्याम्        अस्माभि :
चतुर्थी              मह्यम्               आवाभ्याम्        अस्मभ्यम्
पञ्चमी            मत्                    आवाभ्याम्        अस्मत्
षष्ठी                मम                    आवयो :           अस्माकम्
सप्तमी            मयि                   आवयो:            अस्मासु


युष्मद शब्द रूपाणि    

विभक्ति/वचन एकवचन             द्विवचन          बहुवचन

प्रथमा              त्वम्                   युवाम्               यूयम्
द्वितीया          त्वाम्                  युवाम्               युष्मान्
तृतीया             त्वया                  युवाभ्याम्         युष्माभि :
चतुर्थी              तुभ्यम्               युवाभ्याम्         युष्मभ्यं
पञ्चमी            त्वत्                   युवाभ्याम्         युष्मत्
षष्ठी                तव                    युवयो:               युष्माकम्
सप्तमी            त्वयि                 युवयो:               युष्मासु

तत् - वः (पुल्लिङ्ग् )

विभक्ति/वचन एकवचन             द्विवचन          बहुवचन
प्रथमा              स:                      तौ                    ते
द्वितीया          तम्                    तौ                    तान्
तृतीया             तेन                    ताभ्याम्            तै:
चतुर्थी              तस्मै                 ताभ्याम्            तेभ्य:
पञ्चमी            तस्मात्             ताभ्याम्            तेभ्य:
षष्ठी                तस्य                 तयो:                  तेशाम्
सप्तमी            तस्मिन्             तयो:                  तेषु

तत् - वह  (स्त्रीलिङ्ग )    

विभक्ति/वचन एकवचन             द्विवचन          बहुवचन

प्रथमा              सा                       ते                     ता:
द्वितीया          ताम्                   ते                      ता:
तृतीया             तया                   ताभ्याम्            ताभि:
चतुर्थी              तस्यै                  ताभ्याम्            ताभ्य:
पञ्चमी            तस्या:                ताभ्याम्            ताभ्य:
षष्ठी                तस्या:               तयो:                 तासाम् 
सप्तमी            तस्याम्              तयो:                 तासु 

तत् - वः (नपुन्सक्लिङ्ग् )

विभक्ति/वचन एकवचन             द्विवचन          बहुवचन

प्रथमा              तत्                     ते                     तानि 
द्वितीया          तत्                     ते                     तानि 
तृतीया             तेन                     ताभ्याम्           तै:
चतुर्थी              तस्मै                  ताभ्याम्           तेभ्य:
पञ्चमी            तस्मात्              ताभ्याम्           तेभ्य:
षष्ठी                तस्य                  तयो:                तेशाम्
सप्तमी            तस्मिन्              तयो:                तेषु
 
किम्  - क्या  (पुल्लिङ्ग् )

विभक्ति/वचन एकवचन             द्विवचन          बहुवचन

प्रथमा              क:                      कौ                   के
द्वितीया          कम्                    कौ                   कान्
तृतीया             केन                    काभ्याम्           कै:
चतुर्थी              कस्मै                 काभ्याम्           केभ्य:
पञ्चमी            कस्मात्             काभ्याम्           केभ्य:
षष्ठी                कस्य                कयो :               केशाम्
सप्तमी            कस्मिन्            कयो :                केषु


किम्  - क्या  (स्त्रीलिङ्ग )

विभक्ति/वचन एकवचन            द्विवचन          बहुवचन

प्रथमा              का                      के                    का:
द्वितीया          काम्                   के                    का:
तृतीया             कया                   काभ्याम्          काभि:
चतुर्थी              कस्यै                  काभ्याम्          काभ्य:
पञ्चमी            कस्या:                काभ्याम्          काभ्य:
षष्ठी                कस्या:               कयो :               कासाम्
सप्तमी            कस्या:               कयो :               कासु

किम्  - क्या  (नपुन्सक्लिङ्ग् )

विभक्ति/वचन    एकवचन     द्विवचन          बहुवचन

प्र.                   किम्                 के                  कानि
द्वि।               किम्                 के                  कानि
तृ                    केन                  काभ्याम्        कै:
च                    कस्मै               काभ्याम्        केभ्य:
पं                    कस्मात्            काभ्याम्        केभ्य:
ष                    कस्य                कयो :            केशाम्
सप                 कस्मिन्            कयो :            केषु



कृपया याद रखें कि  सर्वनाम शब्द रूप में अष्टमी विभक्ति यानि  सम्बोधन नहीं होता।

सबकी दोस्त,

लक्ष्मी  :-